Thursday, July 22, 2010

ऐसे प्रोजैक्ट लगाएं, बचेगा जल

मानसून के मौसम में अरबों मिलियन लीटर पानी बेकार चला जाता है। इससे निजात पाने के लिए वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देना जरूरी हो गया है। अगर देश में टिकाऊ विकास करना है तो गिरते भूजल को रोकना होगा। इस सोच को कामयाब करने के लिए फाजिल्का के सीनीयर एडवोकेट जयपाल सिंह संधू ने पानी रीचार्ज प्रोजैक्ट बनाया है। इसके जरिए पानी को समुचित मात्रा में रिचार्ज हो किया जा रहा है। भले ही यह प्रोजैक्ट छोटे स्तर पर शुरू किया गया है, लेकिन जल संरक्षण में काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। 

फिल्टर होकर धरती में समायेगा दूषित पानी

मानसून का मौसम है और बारिश का पानी पानी गलियों में खड़ा हो जाता है। यह सिस्टम निचले इलाके में बनाया गया है, ताकि बारिश और टीवी टावर कालोनी के करीब 500 घरों की नालियों और गलियों का पानी इसमें पहुंच सके। आगे सिस्टम दूषित पानी को साफ करके धरती के अंदरले हिस्से में पहुंचा देता है। इससे गलियों और नालियों में दूषित पानी जमा नहीं होगा और दूषित पानी से बीमारियां भी नहीं फैलेंगी। इसके अलावा सीवरेज सिस्टम जल्दी खराब नहीं होगा। 

सरकार दे प्रोत्साहन

एडवोकेट संधू ने बताया कि जलवायू परिवर्तन दुनिया में चिंता का विषय बना हुआ है। भूजल गिरने के कारण ग्लेशियर पिंघल रहे हैं और नदियों में पानी कम हो रहा है। इन कारणों के चलते कहीं बाढ़ आ रही है तो कहीं सूखा पड़ गया है। अगर देश में ऐसे प्रोजैक्ट लगाये जाएं तो इन मश्किलों से छुटकारा पाया जा सकता है। इस मौके पर मौजूद ग्रेजूऐटस वैलफेयर एसोसिएशन फाजिल्का के सरंक्षक व ऊर्जा पुरूष डा. भूपिन्द्र सिंह ने बताया कि जलवायू परिवर्तन की चुनोती का सामना करने के लिए सरकार को ऐसे प्रोजैक्ट लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

कौंसिल देगी आधी हिस्सेदारी

नगर कौंसिल के अध्यक्ष अनिल कुमार सेठी ने भी इस प्रोजैक्ट को देखा है। उन्हें यह प्रोजैक्ट पसंद आया है। वह कहते हैं कि ऐसे प्रोजैक्ट लगाने वाले व्यक्ति को कुल खर्च का 50 प्रतिशत हिस्सा नगर कौंसिल की ओर से दिया जाएगा। कौंसिल की अगली बैठक में प्रस्ताव पास किया जाएगा।

कबाड़ हो गए लाखों के झूले

15 June 2010
फाजिल्का-पूर्व राज्यसभा सदस्य वीरेंद्र कटारिया के इलाके में नौनिहालों को भेंट की गई सौगात 'चिल्ड्रन पार्क' अब कबाड़खाना बन गया है। इसका मुख्य कारण नगर कौंसिल की अनदेखी है। करीब चार-पांच साल से झूलों को ठीक करवाकर चलाने के दावे करने वाली नगर कौंसिल ने आखिरकार उक्त झूलों को कबाड़ घोषित कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि पूर्व सांसद वीरेंद्र कटारिया ने संसदीय कोटे से फाजिल्का व अबोहर में दो चिल्ड्रन पार्क बनवाए थे। फाजिल्का के प्रताप बाग में बनाए गए चिल्ड्रन पार्क में बच्चों के मनोरंजन के लिए इलेक्ट्रिकल झूले लगाए गए थे, जिन पर करीब आठ लाख रुपये खर्च आया था। इन झूलों की मेंटीनेंस के लिए लोगों से शुल्क भी लिया जाता था। पार्क के प्रति लोगों ने काफी उत्साह भी दिखाया था। लोग अपने बच्चों को पार्क में स्थापित छुक-छुक ट्रेन, कैटर पिल्लर व अन्य झूले पर मनोरंजन के लिए पार्क लाते थे। लेकिन नगर कौंसिल बच्चों के इस सौगात को ज्यादा देर तक संभाल नहीं सकी। धीरे-धीरे पार्क में लगे सभी झूले तकनीकी खराबी के चलते बंद हो गए और पार्क को ताला लगा दिया गया। प्रताप बाग आने वाले बच्चे पिछले पांच साल से ललचाई नजरों से पार्क में लगे झूलों को देखकर ही वापस लौट जाते है।

एक बार सर्दी में अलाव से छुक छुक ट्रेन का बड़ा हिस्सा जल गया। तब भी थोड़ी मरम्मत के बाद झूले चलने की उम्मीद बाकी थी। नगर कौंसिल भी करीब दो साल से प्रस्ताव पारित कर झूलों की मरम्मत पर दो लाख रुपया खर्च कर पार्क का संचालन ठेके पर देने की बात कह रही है। लेकिन न तो किसी ने पार्क का ठेका लिया और न ही कौंसिल ने झूले ठीक करवाए।

इस बारे में जब नगर परिषद अध्यक्ष अनिल सेठी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि पार्क में लगे झूले बिल्कुल खराब हो चुके हैं वह सही नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि उन झूलों को बेचकर नए झूले लगाने का प्रबंध किया जाएगा। जब उनसे यह पूछा गया कि नए लगने वाले झूले भी इलेक्ट्रिकल होंगे तो उन्होंने कहा कि यह तो बजट पर निर्भर है।

आबादी छह हजार, सुविधाएं कुछ नहीं

Jul 21, 11:08 pm
फाजिल्का-करीब छह हजार की आबादी वाले गांव कुहाड़ियांवाली के बाशिंदे को पेयजल मुहैया करवाने के लिए वाटर व‌र्क्स तक नहीं है। इतना ही नहीं, गांव के बच्चों की शिक्षा के लिए कोई हाई या एलीमेंट्री स्कूल भी नहीं है।

गांव बुर्जा से पीने के लिए स्वच्छ पानी की सप्लाई की जा रही है, लेकिन रास्ते में कई जगह पाइप लीकेज होने के चलते ग्रामीणों को पर्याप्त पानी तक नहीं मिल पाता। गांव में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल है, लेकिन शिक्षा पूरी होने के बाद बच्चों को एलीमेंट्री, हाई या उससे ऊंची शिक्षा प्राप्त करने के लिए आसपास के गांवों में जाना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी गांव की लड़कियों को हो रही है। इनके अभिभावक उन्हें पांचवीं के बाद पढ़ने के लिए दूसरे गांवों में भेजने से कतराते हैं। गांव तक नहरी पानी भी पर्याप्त मात्र में नहीं पहुंचता, जिसके चलते किसान जमीनी पानी पर ही निर्भर हैं जो कि मोटरों व जेनरेटर पर भारी राशि खर्च करना पड़ता है। गांव में छप्पड़ तो है, लेकिन गंदे पानी की निकासी का प्रबंध नहीं होने से छप्पड़ में महीनों जमा रहने वाला पानी बीमारियां फैलाने का कारण बन रहा है। भयंकर बदबू के कारण आसपास रहने वालों व उसके निकट से निकलने वाले लोगों का सांस लेना तक मुहाल हो जाता है।

गांव की खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए स्टेडियम का निर्माण तो करवाया गया है, लेकिन वह काम भी अधर में लटका होने के चलते सैकड़ों खिलाड़ियों को आगे आने का मौका नहीं मिल रहा। गांव में जिम के नाम पर हॉल तो बना दिया गया है, लेकिन उसमें सामान उपलब्ध नहीं करवाए जाने से लाखों रुपये की इमारत सफेद हाथी बनकर रह गई है। गांव की अधिकांश नालियां व गलियां भी कच्ची हैं। यहां तक कि श्मशानघाट को जाने वाली सड़क की हालत बेहद ही खस्ता है।

कम आय वालों को आसान किस्तों में मिलेगा आवास

17th June 2010
फाजिल्का-शहीद भगत सिंह मार्केट के लिए प्लाट बेचकर खाता खोलने वाले नगर सुधार ट्रस्ट की ओर से अपना आगामी प्रोजेक्ट शहर के करीब आठ सौ बेघर गरीब परिवारों को छत मुहैया कराना है। यह दावा नगर सुधार ट्रस्ट (इंप्रूवमेंट ट्रस्ट) के अध्यक्ष एडवोकेट महिंदर प्रताप धींगड़ा ने किया है।

धींगड़ा ने बताया कि शहर के सैनियां रोड पर सैकड़ों लोगों ने अवैध रूप से सरकारी जगह पर कब्जा जमा रखा था, जिसे पिछले दिनों नगर परिषद ने भारी मशक्कत के बाद खाली कराया है। साथ ही नगर परिषद ने करोड़ों रुपये की उक्त जमीन के एक हिस्से पर गरीब परिवारों को प्लाट देने का वादा किया है। उससे एक कदम आगे बढ़ाते हुए नगर परिषद ने लो सैनियां रोड पर ही लो इनकम ग्रुप (निम्न आय समूह) फ्लैट बनाकर देने का निर्णय लिया है। धींगड़ा ने बताया कि ऐसा करने से एक ही जगह पर कम से कम तीन फ्लैट बन जाएंगे, जिससे जगह भी कम घिरेगी और गरीब परिवार मकान बनाने के झंझट से भी मुक्त होंगे। गरीब आदमी या तो जमीन खरीद सकता है या मकान बना सकता है। अगर वह डीसी रेट पर जमीन खरीदेगा तो उसकी किस्तें उतारना ही उसके लिए मुश्किल होगा और मकान बना पाना उसके बूते से बाहर होगा। ट्रस्ट की योजना से जहां गरीब परिवार को आधुनिक ढंग से बना बनाया मकान मिलेगा, वहीं उन फ्लैट्स में हर सुविधा मिलेगी। अपने द्वारा विकसित किए जाने वाले लो इनकम ग्रुप फ्लैट्स में ट्रस्ट द्वारा नगर कौंसिल के सहयोग से बिजली पानी की व्यवस्था भी दी जाएगी। ट्रस्ट चेयरमैन ने बताया कि गरीब परिवारों के उत्थान के लिए ट्रस्ट की इस योजना को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हरी झंडी दे दी है।

उल्लेखनीय है कि नगर परिषद द्वारा पिछले माह चलाए अवैध कब्जे हटाने के अभियान में दो सौ से अधिक ऐसे लोगों से कब्जे छुड़वाए थे जिन्होंने परिषद की जमीन पर झोंपड़ियां, कच्चे और पक्के मकान बना लिए थे। इसके अलावा भी शहर में लो इनकम ग्रुप के सैकड़ों परिवार हैं, जिनके पास सिर छुपाने के लिए रैन बसेरा नहीं है। अगर नगर परिषद व नगर सुधार ट्रस्ट के दावे सच होते हैं, तो कम से कम आठ सौ से एक हजार फ्लैट बनाए जाएंगे जिनमें ऐसे परिवारों को डीसी रेट पर किस्तों में आवास मिल जाएंगे।

Wednesday, July 21, 2010

Green Man of Fazilka : Advocate Jaipal Singh Sandhu

Advocate Jaipal Singh Sandhu's New House in Fazilka is an example for
many. He has spent almost 5% of the total construction cost amount on
environment protection. Rainwater Harvesting, 4000sqm of dedicated
green belt, 100% CFL, small watershed management n many more. Work of
founder member of Graduates Welfare Association Fazilka is an
inspiration for many like me and I hope Yuva Fazilka will learn a lot
from Advt. Sandhu. His personal budget on environment protection is
more than what Municipal Council Fazilka has spent in last 3 years for
the entire city.

Reference: Daily Sarhad Kesri, 20th July 2010

Tuesday, July 20, 2010

Asia: The Decrease-Fire:: Times Magazine

Friday, Oct. 08, 1965

Perhaps it should be called a decrease-fire. Whatever the word, India
and Pakistan last week demonstrated the flexibility of their own,
ten-day-old ceasefire. From Kashmir to the Sind, patrols probed at one
another, hoping to grab more high ground before the United Nations
truce could be properly policed. During the course of the week, India
charged Pakistan with 42 violations; Pakistan charged India with 26.
The most blatant:
> At Sundra, a caravansary in the salt wastes of the Thar, Pakistani irregulars were doing their laundry one morning when an Indian 3-in. mortar shell slammed into their midst. Killed: a brown goat. The Paks — camel-riding Indus Rangers and bearded Hur rifle men — ducked behind mud walls and blazed back in the best Gunga Din fashion. A strafing run by Indian Vampire jets failed to dislodge the Pakistanis —indeed, they reported, did not even disturb the vultures circling overhead.
> At Fazilka, a farm town south of Lahore, a 100-man Indian company politely asked a band of 1,000 Pakistani marauders to withdraw. At that, claimed the outraged Indians, the Pakistanis opened fire with their rifles. Out numbered 10 to 1, the Indians had no choice but to fight. They killed 59 Paks, while losing only eleven men themselves.
The stories were the same all along the frontier between the two
armies. Only the name of the violator was changed, depending on which
side was making the complaint. With only 41 U.N. observers on hand to
patrol nearly 1,000 miles of contested border, it was impossible to
tell who was the true aggressor. Clearly, both India and Pakistan had
a lot to gain — and little to lose — by trying to grab more territory
while they could. Old U.N. hands recalled that it took 123 days for
the Suez cease fire to really take effect. The Indo-Pakistani
cooling-off period was likely to take just as long — or longer.

http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,842171,00.html

Read more: http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,842171,00.html#ixzz0uDNYofDD

India: The Jinxed Jewel :: Times Magazine

In the early 1950s, the great French architect Le Corbusier designed
the city of Chandigarh as a capital for India's sprawling Punjab
state. Though shantytowns have long since sprung up alongside its
lovely cubes and rectangles, Chandigarh (pop. 150,000) still stands
out like an exquisite jewel in the blazing Punjab plain. From the
first, however, it has been a jewel with a jinx —accursed, like the
Hope diamond.
In November 1966, after savage rioting, the Punjab was split in two,
creating a predominantly Hindu Haryana state and a Sikh-dominated
Punjab state. Both communities demanded exclusive possession of the
capital city. Premier Indira Gandhi promised to settle the matter as
soon as the 1967 elections were out of the way, and in the meantime
allowed Chandigarh to remain the capital of both states.
Three years passed. Last October, an 83-year-old Sikh, protesting the
division of Chandigarh, died on the 74th day of a fast. In the ensuing
crisis Sikh Leader Sant Fateh Singh, who had been threatening
self-immolation off and on since 1966, vowed to go through with it
this time unless Chandigarh was given unconditionally to the Punjab.
He set Feb. 1 as the date. As if to underline the Sant's resolve, his
attendants had collected kerosene and firewood at their holiest
shrine, the Golden Temple in Amritsar. To complicate matters, a Hindu
named K. K. Toofan, fasting outside Indira's residence in New Delhi,
threatened a suicide of his own if Chandigarh was not turned over
outright to Haryana.
No matter what Mrs. Gandhi decided to do, trouble was bound to follow.
She put off a decision as long as possible. But with Sant Fateh
Singh's deadline approaching, she had to make up her mind. Three days
before the Sant's scheduled bonfire, she announced that Chandigarh
would go to the Sikhs; in compensation, the Hindu state would be given
$26 million for a new capital, and in addition would be ceded a part
of the Punjab's fertile Fazilka precinct containing 114 Hindi-speaking
villages.
Fair as the compromise seemed, it enraged both communities. Mobs in
Haryana attacked railway stations and burned trains and buses; eight
persons died in the rioting. Angry Sikhs hurled stones at the Golden
Temple in Amritsar, where elders of the Akali Dal Party released the
fasting Sant Fateh Singh from his suicide vow. "My pledge has been
fulfilled," murmured the Sant, accepting a glass of orange juice from
the temple's head priest. And Chandigarh, named after Chandi, the
North Indian equivalent of Kali, the Hindu goddess of destruction, has
lived up to its name.

http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,876560,00.html

Read more: http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,876560,00.html#ixzz0uDMpf5Jr

Saturday, July 17, 2010

PPCB courts controversy over Sutlej water samples

Chander Parkash
Tribune News Service

Teja Rawela (Fazilka), July 16
A controversy has erupted over the issue connected with the collection of water samples by a team of Punjab Pollution Control Board (PPCB) led by its chairman Rajat Aggarwal from the river Sutlej flowing near this village.

While the residents of this village alleged that officials of PPCB did not enter into the river and asked the children playing at the spot to collect water samples for them, Deputy Commissioner, Ferozepur, KK Yadav, who accompanied the team, claimed that samples of water had been collected in a professional manner by the team members.

Yesterday, a battery of engineers and scientists led by Aggarwal descended on this village, which remained in limelight of late due to the fact that residents of this and its neighbouring villages have been suffering from various ailments due to consumption of polluted water, to collect water samples for laboratory analysis of the same.

The residents said that PPCB engineers and scientists must have taken water samples on their own instead of pressing the children into service for the same task as the children did not know how and from which point water for sampling must be collected.

They added that the PPCB team must have collected water samples before the monsoon rains as due to rains, the water flow in river Sutlej had increased and it had taken a major quantity of pollutants away. They said that they were not aware of the report of laboratory analysis of water samples taken from the same spots in the past few months by different agencies of state government.

Yadav said that residents of village were levelling baseless allegations.

He said that collection of water samples would be a continuous process so that a comprehensive analysis of water could be made for further action.

The Deputy Commissioner said that the Army and the BSF authorities had been involved in this process and they had been asked to report the matter to him immediately whenever they found discoloured, stinking and smell emanating water in river Sutlej so that its samples could be taken without any delay for laboratory analysis.

Meanwhile, the Punjab Water Supply and Sanitation Department, has written warning notes at various points in this and its neighbouring villages asking residents not to use water being drawn through hand pumps as the same is not fit for human consumption

Friday, July 16, 2010

सतलुज और लाधुका डे्रन से सैंपल भरे

सतलुज दरिया के दूषित पानी का प्रकोप झेल रहे गांव तेजा रूहेला की मुख्य समस्या का हल ढ़ूंढऩे में पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड भी जुट गया है। दरिया के दूषित पानी की जांच के लिए वीरवार बोर्ड के चेयरमैन रजत अग्रवाल अपनी पूरी टीम के साथ यहां पधारे। उन्होंने दो स्थानों पर दरिया और अधिक व कम गहराई वाले टयूबवैलों के पानी के सैंपल भरवाये। इसके अलावा लधुका ड्रेन के पानी के सैंपल भी भरे गये। इस मौके पर जिला फिरोजपुर के डीसी कमल किशोर यादव, प्रदूषण बोर्ड फरीदकोट और फिरोजपुर के एस.डी.ओ. दलजीत सिंह, सिविल सर्जन डा. डीपी गोदारा, एसडीएम अजय सूद, तहसीलदार अमरजीत सिंह, सिविल अस्पताल प्रभारी डा. वाईके गुप्ता के अलावा सिचाई विभाग के अधिकारी मौजूद थे। 

एक दर्जन गांव हैं प्रभावित

दरिया के दूषित पानी का प्रकोप करीब दो दशकों से हो रहा है, जिस कारण गांव तेजा रूहेला और दोना नानका सहित करीब एक दर्जन गांव प्रभावित हो है। खासकर गांव तेजा रूहेला में दूषित पानी का प्रकोप सबसे अधिक है। जिस कारण यहां लगभग हर तीसरे घर में अपंग व्यक्ति है। यहां महिलाओं की कोख भी बंजर हो रही है। ग्रामीणों पर दूषित पानी का कितना प्रभाव है, इसका पता लगाने के लिए पहुंचे बोर्ड के चेयरमैन रजत अग्रवाल ने बताया कि वे बोर्ड की जिम्मेदारी को मद्देनजर रखते हुए यहां विशेषज्ञों की टीम सहित आए हैं। 

सरकार ने बनाई कमेटी

अब मानसून का समय है और इस दौरान पानी के सैंपल लिए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों की समस्या का असल कारण क्या है? इस कारण पानी के नमूने लिए गए हैं, ताकि जिन गांवों में दूषित पानी का प्रभाव है। उन ग्रामीणों को सचेत कर सकें और वे सावधान हो जाएं। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर प्रदेश सरकार की ओर से एक कमेटी बनाई गई है, जो सिर्फ इस मुद्दे पर कार्य करेगी। इससे पहले उन्होंने कावांवाली पुल से दरिया के काले रंग के पानी को देखा। इसके अलावा गांव के सरकारी प्राईमरी स्कूल में लोगों से बातचीत की गई। इस मौके पर सरपंच सोमा बाई, दोना नानका के सरपंच हरबंस ङ्क्षसह आदि मौजूद थे।

Thursday, July 15, 2010

लिंगानुपात में मॉडर्न है गांव तेजा रूहेला

सरहदी गांव तेजा रूहेला में कन्या भ्रूणहत्या के प्रति ग्रामीणों को जगरूक करने के लिए न तो कभी स्वास्थ्य विभाग की ओर से शिविर का आयोजन किया गया है और न ही किसी सामाजिक संस्था ने जन जागरण अभियान चलाया है। इसके बावजूद लिंगानुपात के कारण गांव में समाज का ताना बाना कभी नहीं बिगड़ा यानि गांव में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में अधिक है और यह लिंगानुपात पिछले पांच वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि गांव में पिछले 10 बरसों से लगातार महिला को ही सरपंच चुना जा रहा है। बेश्क सतलुज दरिया के दूषित पानी के कारण यहां ग्रामीण अपंग हो रहे हैं और महिलाओं की कोख बंजर हो रही है। इसके बावजूद ग्रमीणों के मन में कन्याओं के प्रति आदर है और वे बेटी को अपनी शक्ति मानते हैं।

सामाजिक उत्थान में आगे है गांव: भौगोलिक परिस्थितियों के चलते भले ही गांव को पिछड़ा हुआ बोल दिया जाए, लेकिन सामाजिक उत्थान में यह गांव राज्य के किसी गांव से पीछे नहीं है। गांव में महिलाओं की संख्या तो अधिक है ही, स्कूल में भी लड़कियों की संख्या ज्यादा है। सरकारी प्राइमरी स्कूल की संख्या मुताबिक 2006 में 49 लड़कों के मुकाबले 57 लड़कियां थी। इसके बाद इस संख्या में इलाफा होता चला गया और 2007 में अनुपात बढ़कर 48 लड़कों के मुकाबले 60 हो गया। 2008 में 89 लड़कियां और 73 लड़के, 2009 में 102 लड़कियां और 79 लड़के थे। इस साल लड़कियां 125 हैं तो लड़कों की संख्या मात्र 86 है। यही स्थिति उसके पड़ोसी गांव दोना नानका की है। जहां बीते साल लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में 5 अधिक थी तो इस साल वहां 10 लड़कियां लड़कों से ज्यादा हैं। 

मेहनत में कम नहीं महिलाएं: सरपंच सोमा बाई और पूर्व सरपंच संतो बाई ने बताया कि उन्हें अपने गांव पर गर्व है। भले ही चंडीगढ़ को मॉडर्न गांव कहा जाए, लेकिन लिंगानुपात में उनका गांव किसी से पीछे नहीं है, यहां महिलाएं भी श्रम पुरुषों की तरह करती हैं। 

उन्होंने बताया कि गांव में तो वे लड़कियों को प्राइमरी तक शिक्षा दिला लेते हैं, लेकिन अठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें तीन किमी दूर गांव माहतम नगर जाना पड़ता है। अगर हायर सैकेंडरी तक पढऩा हो तो आठ किमी दूर गांव झंगड़ भैणी जाना पड़ता है। उच्च शिक्षा के लिए उनके पास फाजिल्का के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि ये लड़कियां भी महिलाओं की इस अलख में भागीदार बनना चाहती हैं, पर इनके लिए कोई सरकारी बस सुविधा न होने के कारण दूर तक जाने के लिए लड़कियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस कारण गांव की लड़कियां उच्च शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। गांव में मुख्य तौर पर दरिया के दूषित पानी की समस्या है, जिसके चलते ग्रामीण शारीरिक रूप से विकलांग हो रहे, लेकिन सरकार उनकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया।

लेजर लैंड लेवलर से बचाया 480 करोड़ लीटर पानी

Dainik Jagran, 7th July 2010
फाजिल्का-बूंद-बूंद पानी बचाने की किसानों द्वारा अपनाई जा रही नई विधि जहां भूजल स्तर गिरने से बचा रही है, वहीं नहरी पानी की कमी की समस्या से निपटने के लिए भी कारगर साबित हो रही है। करीब दो साल पहले पानी बचाने के उद्देश्य से अस्तित्व में आई लेजर लैंड लेवलर मशीन आज हर खेत की जरूरत बनती जा रही है। अकेले एक निजी संस्था ने ही इस यंत्र की मदद से करीब पांच सौ एकड़ रकबे में 480 करोड़ लिटर पानी की बचत की है।

उल्लेखनीय है कि लेजर लैंड लेवलर को ट्रैक्टर से जोड़कर कंप्यूटर व लेजर की मदद से जमीन को इस कदर समतल कर दिया जाता है कि उसमें 25 से 40 प्रतिशत पानी की बचत होने लगती है। लेजर लैंड लेवलर से पानी की बचत के लिए एक एकड़ धान के खेत का उदाहरण ही काफी है। अगर आम खेत, जिसमें जमीन समतल नहीं होती और एक जगह से दूसरी जगह में तीन से चार इंच का अंतर होता है, वहां एक बार में करीब तीन से सवा तीन लाख लिटर पानी लगता है। धान को पूरे सीजन में 30 बार पानी लगाया जाता है। यानी करीब एक करोड़ लिटर पानी की खपत होती है। वहीं अगर लेजर लैंड लेवलर से जमीन समतल करके पानी लगाया जाए तो हर बार सवा लाख लिटर पानी की बचत होती है और पानी भी पूरी जमीन में एक समान पहुंचता है। तीस बार में करीब 40 लाख लिटर पानी बचता है। पानी बचाने के इस ढंग को जहां हर छोटा बड़ा किसान अपनाने को लालायित है, वहीं इस यंत्र की कीमत ढाई से साढ़े तीन लाख रुपये तक होने के चलते हर किसान तक इसे उपलब्ध करवाने के लिए कृषि विभाग 33 प्रतिशत की सब्सिडी पर सहकारी सभाओं व किसानों को उपलब्ध करवा रहा है। लेजर लैंड लेवलर से पिछले एक साल के दौरान चार सौ एकड़ भूमि समतल करने वाली कृषि सेवा कंपनी जमींदारा फार्मसाल्यूशंस ने पांच सौ एकड़ रकबे में लेजर लैंड लेवलर के प्रयोग से 480 करोड़ लिटर पानी बचाया है।

लेजर लैंड लेवलर के बारे में ब्लाक कृषि अधिकारी डा. जोगिंदर सिंह बोपाराय ने कहा कि लेजर लेवलर पानी बचाने में काफी कारगर है। विभाग के जरिए अब तक आठ सहकारी सभाओं व किसानों को लेजर लैंड लेवलर सब्सिडी पर मुहैया करवाए गए है, जिनसे सैकड़ों एकड़ जमीन समतल कर पानी बचाया जा रहा है।

Sunday, July 11, 2010

बीएआरसी की मदद से होगी पानी में यूरेनियम की जांच

बठिंडा : राज्य के मालवा क्षेत्र के पेयजल में यूरेनियम व हेवी मेटल्स की मानक से अधिक मात्रा के मामले में काफी ना-नुकुर के बाद अंतत: राज्य सरकार हरकत में आ गई है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने स्वास्थ्य विभाग को भाभा आटोमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) मुंबई के सहयोग से पेयजल की विस्तृत जांच करने को कहा है। गौरतलब है कि फरीदकोट के बाबा फरीद सेंटर फॉर स्पेशल चिल्ड्रन ने जर्मनी की माइक्रोट्रेस मिनरल लैब की मदद से मंदबुद्धि बच्चों के बालों के सैंपलों में यूरेनियम होने का खुलासा किया था। वहीं, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (जीएनडीयू) अमृतसर के फिजिक्स विभाग ने भी मालवा के पेयजल में यूरेनियम की तय मानक से अधिक मात्रा का खुलासा किया था। इसके बावजूद सरकार ने इसे नहीं माना। कुछ दिन पूर्व जब राज्य मानवाधिकार आयोग में पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (पीपीसीबी) और पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ ने संयुक्त जांच रिपोर्ट में कबूला कि बठिंडा के नेशनल फर्टीलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) और थर्मल प्लांटों के नजदीक के पानी में यूरेनियम की मात्रा तय मानक से अधिक है, तो सरकार को आखिरकार इसकी जांच के लिए तैयार होना ही पड़ा। खास बात यह है कि मालवा क्षेत्र में बढ़ते कैंसर और अपंगता के लिए भी यूरेनियम व दूसरे हेवी मेटल्स को जिम्मेदार माना जा रहा है। ऐसे में सरकार पर इतना दबाव बन गया कि उन्हें जांच के लिए तैयार होना पड़ा। लेकिन हैरानी यह है कि स्वास्थ्य विभाग किसी तरह की जांच करने से पहले मुख्यमंत्री को तीन माह पूर्व की गई जांच की रिपोर्ट भेजने की तैयारी में है, जिसमें यूरेनियम व दूसरे हेवी मेटल्स का स्तर सामान्य पाने का दावा किया जा रहा है। राज्य स्वास्थ्य निदेशक डा. जेपी सिंह ने इस संबंध में मुख्यमंत्री के आदेश मिलने की पुष्टि करते हुए कहा कि कोई जांच और बीएआरसी से संपर्क करने से पहले वह सीएम को तीन माह पूर्व की गई जांच रिपोर्ट भेजेंगे, जिसमें सब कुछ सामान्य है। अगर मुख्यमंत्री दोबारा जांच को कहते हैं तो वह बीएआरसी से तालमेल कर विस्तृत जांच करेंगे। उधर, यूरेनियम मामले की मानवाधिकार आयोग में पैरवी कर रहे रिसर्च सह डायरेक्टर नहरी व पावर पंजाब के पूर्व चीफ इंजीनियर डा. जीएस ढिल्लों ने कहा कि भले ही स्वास्थ्य विभाग पानी में यूरेनियम व दूसरे हेवी मेटल्स की मात्रा सामान्य होने का दावा कर रहा है लेकिन आज तक कभी वह यह नहीं बता सके कि मालवा में कैंसर का ग्राफ इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है और गांव के बच्चे अपंग क्यों हो रहे हैं। इसलिए इसकी विस्तृत जांच करवानी जरूरी है। जीएनडीयू, अमृतसर के फिजिक्स विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डा. सुरिंदर सिंह ने पिछले दिनों रिलीज की अपनी जांच रिपोर्ट में कैंसर के लिए पानी व दूसरे खाद्य पदार्थो में यूरेनियम और दूसरे हेवी मेटल्स की मानक से अधिक मात्रा के जिम्मेदार होने की तरफ इशारा किया था। खास बात यह है कि मालवा के पेयजल में यूरेनियम की घातक स्तर तक मौजूदगी के बाद खुद मुख्यमंत्री भी अपने पैतृक गांव बादल के पानी की जांच करवा चुके हैं। इसमें फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के अलावा सब कुछ सामान्य आया लेकिन पंजाब में सुविधा न होने की वजह से इसमें यूरेनियम के स्तर की जांच नहीं हो सकी। संभव है कि यूरेनियम व हेवी मेटल्स की विस्तृत जांच पर जोर देने के पीछे यह बड़ा कारण हो ..

Saturday, July 10, 2010

अब सरकारी मास्टर भी बनेंगे स्मार्ट

फाजिल्का-सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को प्राइवेट स्कूलों के टीचरों की तरह स्मार्ट बनाने के लिए डायरेक्टर जनरल आफ स्कूल एजूकेशन(डीजीएसई) कृष्ण कुमार ने एक नए तरह का प्रयोग शुरू किया है। इसके तहत माइक्रो टीचिंग कैंपों में अध्यापकों को इंग्लिश को प्रभावी ढंग से पढ़ाने के गुर सिखाए जा रहे हैं। इससे पहले अध्यापकों को ट्रेनिंग देने के लिए नियुक्त रिसोर्स पर्सन को चंडीगढ़ बुलाकर ट्रेनिंग दी गई है।

स्थानीय सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में जारी कैंप के रिसोर्स पर्सन विजय गुप्ता ने मंगलवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि फाजिल्का तहसील में यह कैंप चार चरणों में लगाए जाने हैं, इनमें तहसील के डेढ़ सौ से अधिक इंग्लिश टीचर्स को इंग्लिश पढ़ाने के प्रभावी तरीकों की जानकारी दी जानी है। पहले चरण की शुरुआत पांच जुलाई से हुई है। फाजिल्का में कैंप का शुभारंभ इन सर्विस ट्रेनिंग सेंटर फिरोजपुर के प्रिंसिपल परमवीर शर्मा ने किया। पहले चरण में 40 अध्यापकों को ट्रेनिंग दी जा रही है। उन्हें छठी से आठवीं कक्षा तक का सिलेबस दिया गया है, इसमें ग्रामर, टेक्सट व पैराग्राफ बेहतर ढंग से पढ़ाने की जानकारी स्लाइड प्रोजेक्टर के जरिये दी जा रही है।

गुप्ता ने बताया कि पहले शिक्षा विभाग द्वारा अध्यापकों को तीन-तीन माह में कवर करने के लिए सिलेबस दे दिया जाता था, लेकिन नई अपनाई जा रही तकनीक के अनुसार एक-एक लैसन पढ़ाने के टाइम वाला विजन रखा गया है। अध्यापकों को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि वह विद्यार्थियों को रट्टेबाज बनाने के बजाय समझाया जा रहा विषय अच्छी तरह दिमाग में बिठा लें। बच्चों को पाठ्यक्रम के साथ जोड़ने की विधियां बताई जा रही हैं। बच्चों को समझाने के लिए अध्यापकों को दिए गए फ्लैश कार्ड व पोस्टर पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के सिलेबस में से ही बनाए गए हैं। इस कैंप में गुप्ता के अलावा रिसोर्सपर्सन सुखचैन सिंह व जतिंदर कुमार भी अध्यापकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। दूसरे चरण का कैंप 12 से 17, तीसरे चरण का कैंप 19 से 23 व चौथे चरण का कैंप 26 से 30 जुलाई तक लगेगा। इन कैंपों में पहले तीन दिन इंग्लिश व आखिरी दो दिन एसएस की ट्रेनिंग दी जाएगी

Monday, July 5, 2010

With 7 students in IIT, Fazilka lives up to its name

Chander Parkash
Tribune News Service

Fazilka, July 4
Known for Asia's biggest wool market in pre-partition days and Fazilka jutti (footwear) and its five Padma awardees in the post-partition days, this border town has also made a mark in the field of education.

Seven students of this one of the oldest towns of the country have been selected for different courses in different colleges being run under the aegis of the Indian Institute of Technology (IIT) this year.

"Producing seven candidates for various courses being run by the IITs from this border town, having a a population of about 70,000 is a rare achievement," claimed a section of residents while talking to the TNS. The residents also demanded that the town must be equipped with all the facilities by the state government after taking its potential into consideration as four students made it to various IIT last year also, they added.

Information gathered by the TNS revealed that those students, who were likely to get admissions in various IITs as per their all India ranking included Sumay Gupta, Karan Singh, Rajan Verma, Agam Kalra, Kuldeep Uttam and Gaurav Gulbadhear. One local girl, who did not wish to be named, had been selected for a doctorate course in the IIT.

Information revealed that most of the students, who had made it to the prestigious institutions this year, did not take special coaching from the coaching centres being run in different parts of the country as they preferred to prepare in their hometown only.

Information revealed that about five students of this town are likely to get admission in the MBBS in different medical colleges of Punjab as they had cleared the PMET test conducted by the Baba Farid University of Health Sciences (BFUHS) this year. One other student had cleared all-India medical entrance test.

"Persian meaning of "Fazil" is "learned person" and Fazilka is a town of learned people. Young ones, who hail from Fazilka, are trying their level best to maintain the sanctity of the meaning of name of their town," said Bhupinder Singh, patron, Graduate Welfare Association Fazilka (GWAF). Fazilka, which can boast of having witnessed a revolution in the field of education in 1904 when the first primary school, namely, Arya Kanya Putri Pathshala, was set up here at the time when education for girls was looked down upon, got its first degree college in 1940 and it was set up in the memory of a philanthropist Munshi Ram by his kin.

Though the town faced perpetual neglect by the successive governments of Punjab, its residents kept making a mark in various field by braving all odds and the town managed to earn a niche for itself at the national level in various spheres. "Though the GWAF has not played any role in the achievement made by the students of Fazilka this year in academic fields, we are planning to do something, which can help in producing more doctors, engineers, army personnel and scientist,"said Navdeep Asija, secretary (administration), GWAF. 

http://www.tribuneindia.com/2010/20100705/bathinda.htm#1