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Thursday, September 24, 2009

Asia's Biggest Wool Market at Fazilka - गर्त में समाई एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी

फाजिल्का-भारत के मानचित्र पर फाजिल्का का नाम कभी ऊन की प्रमुख मंडियों शुमार था। फाजिल्का की तुलना इंग्लैंड के मानचेस्टर से की जाती थी जो दुनिया में ऊन का प्रमुख स्थान है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऊन का फाजिल्का से क्या रिश्ता है, लेकिन अब यह बात सपना सा हो गया है। ऊन का व्यापार होना तो दूर सरकार द्वारा जारी ऊन की स्थापित मंडियों की सूची से फाजिल्का का नाम ही गायब हो गया है। उल्लेखनीय है कि आजादी से पहले फाजिल्का न केवल देश की बल्कि एशिया की प्रमुख ऊन मंडी हुआ करता था। लुधियाना से लाहौर वाया फाजिल्का रेल ट्रैक जिसे व्यापारिक नजरिये से अंग्रेजों ने गोल्डन ट्रैक का नाम दिया था, के रास्ते फाजिल्का मंडी में बिकने वाली देश भर की ऊन लाहौर के रास्ते अन्य रास्तों से पूरी दुनिया में सप्लाई की जाती थी। तब फाजिल्का में राम प्रैस व ऊन की सफाई कर उसकी गांठे बनाने वाली कई छोटी-मोटी प्रैस फैक्ट्रियां भी अस्तित्व में थीं। आजादी के बाद जैसे ही गोल्डन ट्रैक बंद हुआ, वैसे ही ऊन का व्यापार गर्त में समाने लगा। रही सही कसर पंजाब सरकार की गलत नीतियों ने पूरी कर दी है। आजादी के बाद लुधियाना की हौजरी फैक्ट्रियों, सेना के जवानों की जर्सियों के निर्माण के लिए ऊन उत्पादकों का माल खपता रहा है। सरकार ने ऊन व्यवसाय को कोई तरजीह नहीं दी, बल्कि मंडी में बिक्री टैक्स दो से बढ़ाकर चार प्रतिशत कर दिया जो राजस्थान में आज भी दो प्रतिशत ही है। साथ ही राज्य सरकार ने गांवों में लगाई जाने वाली अस्थाई ऊन खरीद मंडियां भी पिछले 10-12 साल से लगानी बंद कर दी है। सरकार की अनदेखी के चलते कभी ऊन बाजार के नाम से मशहूर बाजार में अब ऊन का नामोनिशान भी नहीं मिलता। गांवों में ऊन उत्पादकों को अपनी भेड़ो के इलाज के लिए पशु डिस्पेंसरियां व डाक्टर तक नसीब नहीं होते। इसके चलते यहां की ऊन की गुणवत्ता भी धीरे-धीरे कम हो गई। इलाके के अधिकांश गड़रियों व अन्य भेड़ पालकों ने भेड़ पालनी बंद कर दी है। वैसे भी एक भेड़ से छह महीने में आधा किलो ऊन ही प्राप्त होती है, जिसकी अधिकतम कीमत 12 से 14 रुपये (1000-1100 रुपये प्रति मन) होती है। उसमें से भी आठ रुपये तो ऊन काटने वाला ले जाता है। शेष चार छह रुपये गड़रियों की जूती घिसाई में निकल जाते है। जो थोड़ी बहुत मांग लुधियाना हौजरी मिलों की थी, वह भी आस्ट्रेलिया की मैरिनो क्वालिटी की ऊन ने समाप्त कर दी है। अब आलम यह है कि कभी सीजन में 25 हजार मन ऊन की आवक होती थी, अब कम होकर साढ़े चार सौ मन तक सिमट गई है। पिछले साल साढ़े चार सौ मन आवक के मुकाबले इस बार उतनी आवक होने की संभावना भी नहीं है। ज्यादा टैक्स के चलते अधिकांश ऊन उत्पादक अपनी ऊन राजस्थान के हनुमानगढ़ व अन्य मंडियों में ले जाकर ऊन बेच रहे है, ताकि हौजरी फैक्ट्रियों से नकारी यहां की ऊन बीकानेर की फैक्ट्रियों में कारपेट बनाने

Thursday, December 27, 2007

मुद्दा एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी फाजिल्का की दुर्दशा

फाजिल्का-कभी एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी का गौरव प्राप्त करने वाली फाजिल्का ऊन मंडी वर्तमान में सरकारी अनदेखी के चलते दुर्दशा की शिकार होकर रह गई है। एक वक्त था जब इस मंडी में राजस्थान व हरियाणा तक और पाकपटन जो अब पाकिस्तान में है, की ऊन बिकने यहां आया करती थी। तब ऊन की खरीद फरोख्त के लिए ऊन बाजार बनाया गया था जो है तो आज भी लेकिन अब वहां ऊन का नामोनिशां तक नहीं है। इस मंडी के पतन का मुख्य कारण भेड़ पालकों को प्रोत्साहन न मिलना है।
उल्लेखनीय है कि फाजिल्का ऊन मंडी कभी एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी हुआ करती थी। आजादी से पहले यहां बिकने वाली ऊन अंग्रेजों द्वारा एशिया में व्यापार के लिए बनाए गोल्डन रेल ट्रैक के जरिये अन्य एशियाई देशों में निर्यात होती थी। यही कारण था कि हर राज्य के ऊन व्यापारी फाजिल्का मंडी को ही पहल दिया करते थे। ऊन के विशाल व्यवसाय के चलते यहां ऊन की साफ सफाई व कताई के लिए कई प्रेस फैक्ट्रियां भी लग गई थीं। प्रेस फैक्ट्रियां लगाने की शुरुआत भी अंग्रेजों ने ही की थी। अंग्रेजों की प्रेस फैक्ट्री के अलावा यहां राम प्रेस, ओम प्रेस, अशोका काटन फैक्ट्री में भी ऊन की साफ सफाई व कताई का कार्य चलता था जो आजकल बंद हो चुकी है। आज आलम यह है कि कभी ऊन के लिए विख्यात फाजिल्का मंडी में ही आज ऊन अपनी पहचान के लिए मोहताज है। इस ऊन मंडी की इतनी दुर्दशा हुई है कि ऊन के व्यापार के लिए बने यहां के ऊन बाजार में आज ऊन की एक भी दुकान नहीं है। हालांकि एक वृद्ध ऊन व्यापारी आज भी ऊन बाजार में अपनी दुकान पर बैठा नजर आता है, लेकिन वह ऊन की बिक्री की बजाए ऊन के व्यापार के सुनहरी दिनों को ही याद करता है।
फाजिल्का ऊन मंडी की दुर्दशा का प्रमुख कारण सरकार द्वारा भेड़ पालकों को सुविधाएं न देना है। कभी अपनी भेड़ों से पैदा ऊन के जरिये फाजिल्का मंडी को एशिया में नंबर वन बनाने वाले भेड़ पालक आज रोटी के लिए मोहताज है। लेकिन जब यह व्यवसाय अपने सुनहरी दौर में था, तब बड़े बड़े जमींदार भी खेतीबाड़ी के सहायक धंधे के तौर पर भेड़े पाला करते थे, लेकिन आज भेड़ों को चराने के लिए चरागाहों की कमी हो गई है। इसके चलते जमींदारों ने तो भेड़ें पालना छोड़ ही दिया और गरीब चरवाहे जिन्होंने अपनी भेड़े बना रखी है, वह सौ, पचास भेड़ों से साल भर में होने वाली तीन से चार हजार रुपये की आमदनी से अपने परिवार का गुजारा चलाने में असमर्थ है और दिहाड़ी करने पर मजबूर है। उन्हे सबसे बड़ी परेशानी सरकारी सहायता न मिलने की है। अगर सरकार अन्य कृषि कर्जो की तर्ज पर ऊन उत्पादन करने वालों को कर्ज व भेड़ों की चिकित्सा जैसी सुविधाएं दे तो ऊन का व्यवसाय फिर से फाजिल्का को एशिया के नक्शे पर विशिष्ट पहचान दिला सकता है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_4001730.html